नेता जी की चप्पल

 व्यंग

नेता जी की  चप्पल

भटिंडा में आप पार्टी नेता केजरीवाल को किसी कार्यकर्ता  ने चप्प्पल क्या पहना दी, देशभर में हंगामा शुरू हो गया। जगह - जगह  इसकी चर्चा  होने लगी। कोई इस पर हंस रहा है तो दूसरा चटखारे लेकर मित्रों को किस्सा सुना रहा है। सबसे ज्यादा परेशानी मीडिया को है।

भाई  अपनी पार्टी के नेता जी है। खुद झुककर चप्पल पहनते परेशानी होती । ये देख एक कार्यकर्ता  ने मदद कर दी। इसमें क्या नई  बात  है? भारतीय संस्कृति में तो दूसरे की मदद करना एक पूण्य काम बताया गया है। कोई पूण्य काम कर रहा तो किसी को क्या परेशानी है। क्यों कोई उसे अच्छा कार्य करने से मना कर रहा है? इसमें आलोचना की क्या जरूरत है? फालतू  शोर मचाने का लाभ क्या है?

वैसे भी हमोर नेताओं को तो कार्यकर्ता  चप्पल पहनाते ही रहे हैं।  वरिष्ठ कांगेस नेता नारायण तिवारी का संजय गांधी को एयरपोर्ट  पर पांव में चप्पल पहनाने का  सीन उस समय के व्यक्ति आज तक नहीं भूले। यूपी की एक दलित नेत्री के सैंडिल कई बड़े अधिकारी समय -समय पर साफ करते रहे हैं। बहिन जी के चरण स्पर्श  करना तो एक आम चलन रहा है। केजरीवाल को तो एक कार्यकर्ता ने चप्पल ही पहनाई  हैं। पिक्चरों  में तो हम देखते हैं कि समर्थक और कार्यकर्ता  नेता जी की तेल मालिश कर रहें हैं।  उनके पांव दवा रहे हैं। मुंंह  से बाहर निकल आए पान के पीप को साफ  कर रहे हैं ।

हमारे एक प्रसिद्ध नेता जी पहलवान  रहे हैं। जवानी में बहुत कुश्ती लड़ी। दंगल में खूब जोर आजमाया। किंतु किसी चेले ने गच्चा दे दिया तो  उनका चेले चपाटों से विश्वास हट गया। हो सकता है तेल मलते किसी ने नेता जी को रगड़ा ज्यादा मार दिया हो। पांव में सैंडिल पहनाते फीता ज्यादा कस दिया हो।

हाल के  लोकसभा चुनाव में  उन्होंने बहुत सारे प्रत्याशी उतारे ।  सब हार गए । घर के ही रिश्तेदार जीत कर पार्लियामेंंंट पहुंचे। इसमें उनकी क्या गलती । जब घरके जीतने हैं तो बाहर वालों को क्यों टिकट दें। नेता जी दो सीट से चुनाव लड़े। दोनों पर विजयी हुए। एक सीट छोडऩी थी। एक सीट  छोड़ी और उसपर अपने पौते को खड़ा कर दिया । इसमें  क्या गलत है।  उनकी पार्टी का जब कोई दूसरा यूपी में नहीं जीतना। सो सीट को खोई जाए । घर वालों को ही न लडाय़ा जाए।  पूरा पार्लियामेंट बोर्ड घर में होना ज्यादा ठीक है। सलाह मश्वरे को मीङ्क्षटग बुलाने आदि का झंझट खत्म । चाहे चाय की टेबिल पर विचार कर लो । या खाने की मेज पर बाहर जाने की जरूरत ही नहीं।

अशोक मधुप  

27/07/2014








Comments