अब तो समर्थक भी नहीं झगड़ते


मिया जुम्मन भी क्या है किसी न किसी समस्या को लेकर परेशान रहतें हैं। बिल्कुल देश के आम नागरिक की तरह । कभी उसकी समस्या मंहगाई  होती है। तो कभी बेरोजगारी। कभी  गन्ना मूल्य का भुगतान उन्हें सोने नही देता तो कभी प्याज का अच्छा दाम न मिलने पर उनके सामने  परिवार को रोटी रोजी उपलब्ध कराने की समस्या रहती है।

आज फिर आ धमके और बोले -भाई   नेताओं के ये कैसे समर्थक हो गए। अब अपने नेता के लिए दूसरों से लड़ते झगड़ते नहीं। हमारे समय के समर्थक तो जरा -जरा सी बात पर दूसरे नेता के समर्थकों के सिर फोड़ते , गोली चलाने यहां तक की कत्ल करने तक को तैयार रहते थे। पता  नहीं आज के समर्थकों को क्या हो गया  नेता जी की बुराई  सुनकर इनके खून में उबाल नहीं आता । इनकी जवानी को जोश नहीं चढ़ता।

मैंने कहा कि पहले नेता का कैरेक्टर होता था। वह जिस पार्टी  से जुड़ जाता था ता उम्र उसी में रहता। न दल बदलता और न अपना नेता। सो  उसके समर्थक भी ऐसेे ही होते थे। अब जब नेताओं का  कोई केरेक्टर  नहीं रहा तो समर्थक ही क्यों केरेक्टर रखे। वह भी समझ गया है कि आज इनके साथ है, कल को इनके साथ दाल न गली। दाल -भात  का यहां इंतजाम न हुआ तो इनके विरोधी  नेता के पास जाना पड़ सकता है। जब नेता  जी एक खूंटे से बंध्ंा कर  नहीं रहते तो वह ही क्यों इनसे बंधे? क्यों इनके लिए  सिर फुटव्वल करे? नेताओं की देखा -देखी अब समर्थकों ने भी चोला बदलना शुरू कर दिया। उसे कहीं नेतागिरी तो मिलनी नहीं , जहां मिलेगी चमचागिरी करने को ही मिलेगी। कहीं सादा -दाल भात मिलेगा, तों कहीं दाल में कुछ देशी घी मिल जाएगा। इससे ज्यादा मिलने वाला नहीं है।

फिर पहले नेताओं के पास ले -देकर एक टूटी -फूटी जीप होती थी। उसी में उनके समर्थक नेता जी के साथ धूल मिट्टी फांकते घूमते थे। समर्थक ही नेता जी के सुरक्षा कर्मी भी होते थे। अब नेताओं ने समर्थकों पर विश्वास करना बंद कर दिया। सुरक्षा को गनर रखने शुरू कर दिए। लंबी- लंबी एसी गाड़ी संभाल लीं। नेताओं  को एसी का सुख मिला तो समथ्र्रकों को भी एसी की हवा लग गई।  अब उसे झगड़े में चोट लगने का डर लगता है, तो जेल में गर्मी।

जैसा नेता जी कर रहे हैं, वैसा ही समर्थक भी सीख रहा है।  इसीलिए अब चुनाव बीत जाते हैं। कहीं भी न झगड़ा होता है, न बलबा। न दंगा ,  न फसाद।  न बूथ  कैप्चर । जो होता है। गुपचुप होता है। सैङ्क्षटग से होता है। शोर मचाकर नहीं होता।

अशोक मधुप

 

इसी लिए  अब न चुनाव पर झगड़े होतेें हैं, न मचती है मारकाट 

18/04/2014


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