अब मंथन हो रहा है
व्यंग
राजनीति भी अजीब शै है। जब तक ताकत में हैं । तबतक मदमस्त है । किसी के दुख -दर्द से कुछ लेना -देना नहीं। बस अपना उल्लू सीधा करना है। जब सब कुछ लुट गया। सफीना मझधार में डूब गया तो सब मंथन करतें हैं। जब ताकत थी, तब कभी मंथन नहीं हुआ। तब तो जो कहा वो ब्रह्म वाक्य था।
माया मंथन कर रही हैं। बहुत बड़े शॉक में है। समझ नहीं आया - क्या हुआ? कैसे पूरी सोशल इंजीनियार फेल हो गई। मुलायम मंथन कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश का यादव कैसे हिंदू बन गया? अजित गम में हैं कि उनके बिरादर जट ही उन्हें धोखा दे गए। वे जाट धोखा दे गए जिन्हें उसने कुछ ही दिन पूर्व केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण दिलाया था। जाट तो उनके पक्के थे। वे भी हिंदू हो गए। खुलकर तो नहीं बोल पा रहे पर सब मन -मन में कह रहें होंगे कि सारे वोटर अहसान फरामोश निकले। सब ने धोखा दे दिया। सब हिंदू बन गए और मोदी को जाकर राजतिलक कर दिया।
सब मंथन कर रहे हैं। चुनाव में मुलायम का कुनबा तो बच गया । लालू का तो कुनबा ही राजनैतिक वैतरणी में डूब गया । पत्नी बेटी दोनों धराशाई । पांच सासंदों के बूते पर केंद्रीय उड्डन मंत्री बने अजित सिंह , खुद भी गए बेटे को भी ले गए। बड़ी आशा लेकर राजनीति के चाणक्य ठाकुर अमर सिंह उनकी शरण में आए थे । सोचते थे कि अजित उन्हें और उनके नजदीकी जयाप्रदा को संसद पहुंचा देंगे। सब कुुछ उल्टा पलटा हो गया। अजित मंथन कर रहें है तो अमर सिंह भी चिंतन में है? सब मंथन कर रहे हैं कब? जब बसती उजड़ गई। जब बसती बसी थी तब नहंीं सोचा कि जनता का भला कैसे हो?
चुनाव में मुुलायम कहते थे। हम देखेंगे 56 इंच का सीना। पर दूसरे ने वो धोबी पाट मारा कि मुलायम जैसा पुराना पहलवान भी चारों खाने चित्त हो गया। घर -घर के बचे । वे भी जुगाड़ से । सारा पार्लियांमेंट्री्र बोर्ड घर में । किसी महत्वपूर्ण मसले पर बाहर जाने की जरूरत नहीं। चाहें नाश्ते की टेबिल पर विचार कर हो या खाने के दौरान। तीसरा मोर्चा बनाकर प्रधान मंत्री बनने का ख्वाब देखने वाले मुलायम डिपे्रसन में हैं। जब संासद नहीं तो क्या करें। मोदी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आए हैं। कमजोर होते तो जोड़ -तोड़ भी करते डराते धमकाते भी । सोदे बाजी भी होती। भले ही जनता के समाने एक दूसरे को गाली देते।अब तो पंाच साल चुप्पी ही साधकर रहना होगा।
देवताओं राक्षसों ने सर्व प्रथम समुद्र मंथन किया था। उसमें से 14 रतन मिले थे। वहां रतन पाने को मंथन हुआ था। यहां रतन लुट जाने पर मंथन हो रहा है। इस बात पर मंथन हो रहा है कि वो वोटर हमें बेबकूफ कैसे बना गया, जिसे हम बरसों से बेबकूफ बना रहे थे। लगा हमारे साथ रहा। जै हमारी बोलता रहा । और वोट देने के समय बटन कमल के सामने का दबाता रहा। हमारा धोखा देने वाला, मतलब गांंठने वाला पाठ किसने वोटरों को पढ़ा दिया। वोटर ने ऐसा तुरप का इक्का मारा कि पांच साल तक हमारा संसद जाने का रास्ता ही बंद कर दिया। प्रधानमंंत्री बनने की जुगाड़ में थे, मंत्री से भी गए।
अशोक मधुप
25/05/2014
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