नेताओं के लिए स्कूल
नेताओं के लिए स्कूल
मियां जुम्मन आजकल परेशान है । समझ नहीं आ रहा क्या बिजनेस करे? जिस जगह हाथ डालते हैं वही उलटा बैठता है।
मैने उन्हें सुझाव दिया -मिया एक स्कूल खोल लो। वे बोले कैसा? मैंने कहा - ऐसा स्कूल खोलो जिसमें नेताओं को गाली देना सिखाया जाए। दूसरों को अपमानित करने का फार्मूला बताया जाए। शर्त यह होनी चाहिए कि स्कूल में सिखाई गाली और अपमानित करने की कला ऐसी हो कि चुनाव आयोग उस पर कार्रवाई न कर सके। यानी गाली दी जाए तो पार्लियामेंट्री भाषा में । स्कूल में ऐसे शिक्षक रखे जाए जो राजनेताओं के लिए नई भाषा गढ़े। आज सारे नेता परेशान है। कुछ भी बोलते हैं मीडिया पकड़ लेता है। उसके पकड़ते ही चुनाव आयोग कार्रवाई करता है। मुकदमें दर्ज करा रहा है। यूपी में तो कमाल हो गया। उल्टा सीधा बोलने के माहिर कैबनेट मंत्री आजम खां के रोड शो और सभाओं पर चुनाव आयोग ने रोक लगा दी। ये ही हशर भाजपा के यूपी के प्रभारी अमित शाह का हुआ। अब दोनों परेशान हैं कि काम कैसे चले? बिना बोले रह नहीं सकते। बोलते ऐसा है कि मुंह खोलते ही मीडिया पकड़ लेता है। स्कूल में इन्हें ऐसे शब्द सिखाए जाए कि न मीडिया पकड़े । न आयोग कुछ कर सके। जैसे अपने समय की सबसे विदूषी विद्योतमा को नीचा दिखाने के लिए उस समय के विद्वानों ने करिश्मा किया था। उस महामूर्ख कालीदास को विद्योतमा का शास्त्रार्थ करा दिया था, जो उसी डाली को काट रहा था जिसपर वह बैठा था।
मिया जुम्मन बोले- एक बात और हो सकती है कि नेताओं को ऐसी ट्रेङ्क्षनंग भी दी जाए कि जनता द्वारा मारे गए जूते चप्पल उन्हें न लगे। जूड़े -कराटे में तो दुश्मन से बिना शस्त्र लडऩे की कला सिखाई जाती है। इसमें विरोधियों के फेंके गए जूते-चप्पल और टमाटर से बचने की कला सिखाई जाए। अभी तो राजनेताओं से निराश जनता ने गुस्सा करना सीखा है। आगे चलकर नेताओं के आचरण से जनता में निराशा और ज्यादा बढ़ेगी। आने वाले समय में उसका गुस्सा और ज्यादा बढ़ेगा। ऐसे में नेताओं के हित में रहेगा कि जूते -चप्पल के हमलेे से बचने की कला सीखी जाए। मैंने कहा -देख लो -मौका है अभी किसी बिजनैसमैन के दिमाग में यह आइडिया नहीं आया।ं तुम शुरू कर दो,लाभ में रहोगे।
अशोक मधुप
14/04/2014
Comments
Post a Comment