राजनेता और ताश का खेल


व्यंग्य


 मिया जुम्मन आज कुछ  चहकते नजर आए। दूर से ही आवाज देते चले आ रहे थे। मेरे कहने से पहले ही मूढ़े पर बैठते हुए बोले - देखा मैंं कहता था न कि प्रत्येक व्यक्ति सब काम नहीं कर सकता। दावे कितने करे ।  सच्चाई  कुछ और होती है। अब मोदी को ही लो । पूरे चुनाव में सैंकड़ों दावे किए । किं तु चुनाव बाद काम करने में  पसीने छूट रहे हैं। पांच राज्यपाल नहीं हटाए जा रहे। दो ने खुद ही  त्यागपत्र दे दिए। बाकी आंख दिखा  रहें है। जबकि भाजपाई  दावें कर रहे हैं कि देखते रहिए अभी कौन कौन हटतें हैं?

थूक गटकते वह आगे बोले- भाई कुछ भी हो हटाने रखने में मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश  को महारथ हासिल है। लोकसभा चुनाव हारते ही ३६  ओहदा प्राप्त मंंत्रियों को  एक बार में हटा  दिए। सपा की पूरी कमेटी भंग कर दीं। 50-50,60-60 आईएएस , आईपीएस अधिकारी तुरंत बदल दिए। चुनाव बाद से रोज थोक में अधिकारी बदलें जा रहे हैं। एक बिजली कंपनी का कभी विज्ञापन आया था- घर के सारे के सारे बदल दूंगा। यूपी के  माहौल को देखकर लगता है कि ये भी सारे अधिकारियों को इधर से उधर करके छोड़ेंगे। इतना ही नहीं  पुलिस सिपाहियों को भी घर से दूर तैनात करने की तैयारी है। अधिकारी रोज ताश के पत्तों की तरह फेंटे जा रहे हैं। आज यहां । कल वहां। एक- एक माह में कई- कई  तबादले।  आगरा से तबादले पर आए एसपी ने मुरादाबाद में शाम साढ़े चार बजे चार्ज लिया। कुछ ही देर में नया आदेश आ गया। बस काम -धाम कुछ करना नहीं। अटैची तैयार रखो। आदेश मिले और चल दो।

कुछ रूककर मिंया जुम्मन बोले - यार लगता है कि मुलायम सिंह को पहलवानी के साथ ही ताश खेलने का भी शौक रहा है। उनका यही शौक अखिलेश में भी आ गया है। तभी तो ताश के पत्तों की तरह  यूपी के अधिकारी फेंटे जा रहे हैं। अधिकारियों के धकाधक हो रहे तबादलों से लगता है कि यह काम कोई  बढिय़ा ताश खेलने वाला ही कर सकता है। राजनीति में आने वाले को शतरंज तो खेलनी आनी ही चाहिए। उससे  राजनीति के गुर आते हैं। कहां शै  दी जाती है  और कहां मात की जाती है, पता होता है। शतरंज के साथ नेताओं को ताश खेलना भी आना चाहिए। मोदी संघ के स्वयं सेवक रहे । इसलिए उन्हें ताश खेलने का शायद मौका नहीं मिला। वे वैसे बहुत तेज  है किंतु ताश खेलना आता होता तो बात ही कुछ और होती। कब -कैसे पत्ते फेंटे जातें हैं, उन्हें आता। कहां कया चाल चलनी होती है? उनकी जानकारी में होता। कहां तुरप का पत्ता चलना है,  उसकी उन्हें समझ होती।

अशोक मधुप

22/06/2014


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