हारों का प्रधानमंत्री
व्यंग
मियां जुम्मन आजकल बहुत ज्यादा तनाव में हैं। चुनाव होने के बाद भाजपा की सरकार बने एक माह हो गया किंतु उनकी परेशानी कम नहीं हो रही। काफी चुप-चुप से हैं मनमोहन सिंह की तरह। शांत है माया की तरह । दुखी है मुलायम की तरह। उजड़े से है नितीश की तरह। लुटें से हैं अजित की तरह। आज तो बहुत थके से लग रहे थे। मूढ़े पर बैठते भी उन्हें मेहनत सी करनी पड़ी। बैठने में बड़ा जोर लगाना पड़ा। मूढ़ासीन होते ही आसमान की ओर जाने कहां देखने लगे। मैने पानी पिलवाकर उनके लिए चाय मंगाई। बातचीत शुरू करके के लिए पूछ ही लिया- क्या बात है। क्यों परेशान हो?
चाय का घूंट लेते हुए बोले -यार गजब हो गया। ऐसा नहीं होना चाहिए था। चुनाव हुए दो माह होने को आ गए। चुनावी हार के बाद की देश के बड़बोलों की चुप्पी अच्छी नहीं लग रही। सोनिया का राहुल को राजतिलक करने का सपना टूट गया। मुलायम का तीसरे मोर्चे की जीत का ख्वाव और उसके माध्यम से उनका प्रधान मंत्री बनने का इरादा ध्वस्त हो गया। माया दलितों के माध्यम से पीएम की कुर्सी पर पंहुचने का रेत का महल धराशाई हो गया। लालू नितीश,किस किस की भद नहीं पिटी। अजित खुद तो डूबे ही जंयत को भी ले डूबे। दुर्भाग्य कि मिलजुलकर सरकार बनाने का सपना देखने वाले नेता मिलजुल कर विपक्ष भी नहीं बना पा रहे।
मेज पर कप टिकाते बोले-अरे मिलीजुली सरकार के प्रधानमंत्री नहीं बने तो लोकसभा में विपक्ष के नेता तो बन सकतें हैं। मिल कर यही काम कर लें। विपक्ष के नेता को कैबनेट मंत्री का दर्जा होता है। यह तो मिल ही सकता है। जो मिल गया उसी पर संतोष कर लेना चाहिए। बुजूगों ने कहा भी है- सारा जाता देखिए आधा लीजे बांट। पर इसके लिए भी तैयार नहीं।
मैन कहा मियां। इनकी हार से आपका क्या लेना देना? आप क्यों शांंत है ? वे बोले भाई इनका दुख नहीं देखा जाता। सब परिस्थिति में मनमोहन का सा इनका मौन अब बर्दाश्त नही होता। अगले चुनाव आने तक केपांच साल ये कैसे काटेंगे ये समझ में नही आ रहा।
मैने कहा एक काम करो-इन्हें सलाह क्यों नहीं देते। कि यह हारे हुए नेताओं का एक गठबंधन बना लें । उसके अध्यक्ष का नाम प्रधानमंत्री रख लें। छह -छह माह बाद चुनाव कर नए- नए व्यक्ति को प्रधान मंत्री बनाते रहें। हार के पांच साल के समय में सब का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो जाएगा। मोदी ने चुनाव से पूर्व कागजी लालकिला बनाकर उसपर भाषण नहीं दिया था क्या? ये भी तो ऐसा ही कर सकतें हैं। हमारी गली में एक नेता जी हैं। वे मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। कभी एमएलए भी नहीं बने। मिलने वालों ने उन्हें सीएम कहलाना शुरू कर दिया। उन्होंने भी अब अपने घर पर सीएम की प्लेट लगा रखी है। ये भी तो ऐसा कर सकतें हैं। कौन रोक रहा है? निर्वासित भी तो सरकार बनाते हैं। ये भी ऐसा ही कर लें।
अशोक मधुप
30/06/2014
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