नेताओं पर बढ़ती जूतों की बौछार
24/12/2010
स्वााधीनता दिवस कार्यक्रम में श्रीनगर मेंं ध्वजारोहण कार्यक्रम के दौरान जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर जूता फेंके जाने के बाद जूता पुराण में एक और अध्याय जुड़ गया। जूता पुराण की कहानी इराक यात्रा के दौरान अमेरिकी प्रसिडेंट बुश पर एक पत्रकार वार्ता में जूता फेंकने से शुरू हुई थी। उन पर एक नही दो जूते फेंके गए।हाल ही में लंदन में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी पर भी जूता फेंका जा चुका है। नेताओं के लिए राहत की बात यह है कि जूते फें के जाने की घटनाओं में अभी तक अधिकांश जूते निशाने पर नहीं लगे । हां मुंह पर लगने से कहीं बहुत ज्यादा अपनी धमक और प्रभाव जरूर छोड़ा। नेताओं के लिए यह राहत की बात है कि अब उनपर अंडे टमाटर फेंके जाने बंद हो गए। अंडे टमाटर सड़े गले होते थे तो नेताजी के कपड़े भी खराब करते थे और बदबू भी फैलाते थे। जूते में अच्छा बात यह है कि इसमें बदबू नहीं आती और यह निर्धारित स्थान पर प्राय: लगता भी नहीं।
अब तक की घटनाओं से यह साबित होता है कि जूता फेंकने वाले पेशवर नहीं थे, वे बिल्कुल अनाड़ी ही थे। अगर एक दो माह तक उन्होंने जूता फेंकने का अभ्यास किया होता तो निशाना नहीं चूकता। उमर अबदुल्ला पर तो जूता फेंकने वाला कोई उनका बहुत पे्रमी रहा है, जो उन्हें चोट नहीं पहुंचाना चाहता था। वरना तो कश्मीर में पत्थर फेंके जाने की परम्परा है। रोज फौज और सशस्त्र बलों पर पत्थर फेंके जा रहे है, फिर पत्थर की जगह यहां जूता क्यों फेंका गया ,यह उच्चस्तरीय जांच का विषय हो सकता है।
वैसे अब नेताओं को अब अपनी सुरक्षा में जेड प्लस आदि के कमांडों लेने से ज्यादा इस बात की जरूरत हो गई है कि उनके काफिले में कुछ शू केचर भी रहें। सभा में वे नेताजी के चारों और खड़े हों और जैसे ही कहीं से जूता चले उन्हें तुरंत ही लपक लिया जाए। नेताओं को अब यह मांग भी करनी चाहिए कि वैज्ञानिक ऐेसे राडार बनाए जो उनकी ओर निशाना लगाकर फेंके गए जूते को रास्ते में ही रोक कर तहस-नहस कर दे। वैसे राजनैतिक दलों को पार्टी की सदस्यताा देते हुए नेता से यह शपथ पत्र भरवाना चाहिए कि यदि कभी उसको जूता मारा गया तो उसे फेंके गए जूते को अपने घर के शो केस में सजाकर रखना होगा, जाकि उसे समय समय पर यह याद आता रहे कि किस गलती के लिए उसे यह सम्मान दिया गया। चुनाव आयोग भी चुनाव के लिए आने वाले उममीदवारों से ऐसा अनुबंध ले सकता है। हमारे यहां जूता उछालने की पहली घटना ज्यादा पुरानी नहीं है। पंडित मदन मोहन मालवीय बनारस हिंदू विश्व विद्यालय की स्थापना में लगे हुए थे, किसी राजा से चंदा मांगने गए , राजा ने चंदा देने को मनाकर दिया और उनकी ओर अपना जूता उछाल दिया और कहा ये ले जाओ। पंडित जी ने जूता उठाया और रूमाल में लपेट पर ले गए। जाते समय राजा साहब को धन्यवाद भी दे गए। अगले दिन राजा साहब को बताया गया कि पंडित जी शहर में चौराहे पर उनका जूता नीलाम कर रहें है। राजा साहब का यह बेइजती लगी उन्होने पंडित जी को सादर दरबार में बुलाकर माफी मांगी और चंदे में उन्हें मुंंह मांगी रकम दी। हो सकता है कि कभी जूता फेंकने वाले को अपने किए पर अफसोस हो और वह जूता वापस मांगने आ जाए तो नेताजी के लिए यह लाभ का सौदा साबित हो सकता है।
वैसे जूतों के बढ़ते हमलों केा देखते हुए अब जूता कंपनियोंं केा ऐसा जूता बनाना चाहिए जो सिर्फ पहनने के काम में आए और फेंका न जा सके। जूते के डिब्बे पर भी सख्त वानिंग हो कि जूता पहनने के लिए हैं ,नेताओं पर फेंकने के लिए नहीं। फेंकने वाले जूते आर्डर लेकर बनाए जाने चाहिए ताकि वे दूर तक जा सके और निशाना
बिल्कु ल स्टीक बैठे।
नेट पर अनेक बेवसाइट हैं जो लोगोंं केा विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण देती है। आत्महत्या करने तक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। नेताओं पर बढ़ती जूता फेंकने की घटनाओं के तहत अब सटीक जगह पर जूता फेंकने का्र प्रशिक्षण शुरू होना चाहिए।
अशोक मधुप
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