मियां जुम्मन का बेटा और नौकरी
व्यंग
मियां जुम्मन आजकल परेशान है। लड़का है कि मानने को तैयार नहीं।अच्छी-खासीं नौकरी छोड़कर राजनीति में जाने की जिद किए है। जुम्मन मियां उसे बार - बार बता रहे हैं कि राजनीति बहुत गंदी है। अच्छे व्यक्तियों की यहां जगह नहीं।
वे सवेरे ही वे बेटेे को लेकर आ धमके। समझाओ ना अच्छा खांसा आईएएस है। पर पता नहीं क्या बावलगत सवार हो गई कि राजनीति में जाने को तैयार है । किसी की कुछ मान नहीं रहा।
मैने सलाह दी भाई आइएएस हो । सबसे बढ़िया पोस्ट है। पूरे राजाओं जैसे ठाठ का पद है। 60 साल तक नौकरी करो। खूब पैसा कमाओ । नेताओं से संबंध रखो। रिटायर होते ही राजनीति में आ जाओ। आराम से जिंदगी गुजर होगी। अच्छी खांसी पेंशन मिलेगी। अधिकतर आईएएस और अधिकारी रिटायर्मेंट के बाद राजनीति में आ रहे हैं। अब तो फौज के रिटायर्ड अधिकारी भी राजनीति में उतरने लगें हैं। राजनीति में उमर की तो कोई सीमा है नहीं। बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री रामसुंदर यादव 93 साल की उम्र में चुनाव लड़ रहे हैं। लाल कृष्ण आडवानी 86 साल के होते राजनीति में सक्रिय हैं। मुरली मनोहर जोशी 80 साल के हैं तो मुलायम और शरद पवार 74 के आसपास हैं। सरकारी नौकरी और फौज की सेवा में ही उम्र का प्रतिबंध है। राजनीति में न उम्र का प्रतिबंध न योग्यता की पूछ। अंगूठा टेक भी जुगाडु हो तो यहां कामयाब है। राबड़ी देवी बहुत कम पढ़ी लीखी होने पर भी कई बार बिहार की मुख्य मंत्री रह चुकीं हैं।
वह बोला- अंकल सरकारी नौकरी में और फौज में पेंशन पाने के लिए कमसे कम बीस साल अच्छे रिकार्ड के साथ कार्य करना जरूरी है। नौकरी में इन चोटे राजनेताओं का हर समय दबाव रहता है। सही काम करने पर भी इस चीज की कोई गांरटी नहीं कि आपका संस्पेशन -टरमीनेशन नहीं होगा। फिरो कोर्ट -कचहरी के चक्कर काटते रहो। एक दो कौड़ी का भी नेता कर्मचारी अधिकारी को आकर उल्टी सीधा धमकाता और अपमानिक करता है।
राजनीति में एक दिन के लिए एमएलए वन जाओ या एम पी। पूरी पे मिलती है। किसी का कोई झंझट नहीं। अलग की कमाई से नेता ही नहीं उनके परिवार वालों के भी बैंक बाइलैंस दिन दूने रात चैगने बढ़तें हैं। नौकरी में इंतजार करना पड़ता है। सरकार द्वारा मंहगाई बढ़ाने का। आयोग गठित कर वेतन रिवाइज करने का। राजनीति में कुछ नहीं। सब कुछ अपने हाथ में । जब चाहें मिलकर कितना ही वेतन और भत्ते बढ़ा लो, कोई पूछने वाला नहीं । कर्मचारियों के लिए आयोग की रिपोर्ट लागू करने के लिए दुहाई दी जाती है। खजाना खाली है। सरकार पर इतने करोड़ प्रतिमाह का बोझ पड़ेगा। कर्मचारियों को बढ़ा वेतन लेने के लिए भी लंबा आंदोलन करना पड़ता है। इनके लिए कुछ नहीं । सदन में एक प्रस्ताव रखो और बढ़ालो वेतन।
जुम्मन मियां के बेटे के तर्क का मेरे पास कोई जवाब नहीं था । उसकी बात सुन में चुप रह जाता हूं। सिर्फ चुप रहने के सिवा मेरे पास कोई उपाय भी तो नहीं ।
अशोक मधुप 13/05/2014
Comments
Post a Comment